ऐसे जीने का इरादा तो बिल्कुल नहीं था…
कभी-कभी जब अकेला बैठता हूँ और थोड़ा पीछे मुड़कर अपनी ज़िंदगी को देखता हूँ , तो मन में सबसे पहले यही ख्याल आता है , यार , ऐसे जीने का इरादा तो बिल्कुल नहीं था। लगभग 32 ऋतुएँ देख लीं ज़िंदगी की। कई साल नौकरी करते हुए निकल गए। शादी हो गई। एक और ज़िम्मेदारी ज़िंदगी में आ गई। सुबह उठना , तैयार होना , काम पर जाना , पूरे दिन की भागदौड़ , वापस घर आना , थककर सो जाना और फिर अगले दिन वही सब दोहराना… और देखते ही देखते साल निकलते गए। कभी लगता है अभी तो शुरुआत ही की थी… लेकिन आज पीछे देखता हूँ तो लगभग 7 साल सिर्फ नौकरी करते हुए निकल चुके हैं। और सबसे अजीब बात ये है कि इन सात सालों में बहुत कुछ बदला , लेकिन शायद वो नहीं बदला जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी , मैं खुद। मेरे अंदर का वो इंसान , जिसने कभी ज़िंदगी को लेकर बहुत कुछ सोचा था , बहुत कुछ करने का सपना देखा था , कहीं न कहीं उसी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दबता चला गया। बचपन में लगता था कि बड़े होकर अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जिएँगे। कुछ बड़ा करेंगे। कुछ ऐसा बनाएँगे जिस पर खुद को गर्व होगा। पैसों की इतनी चिंता नहीं होगी। अपने लोगों...