Train No. 13239


ये ट्रैन महज एक ट्रैन नही है ये बिहार और पूर्वांचल के लगभग हर मध्यम  वर्ग के परिवार के उम्मीदों ,  अकांछाओ की रेलगाड़ी है जो अपने अगले जनरेशन को अपने से आगे या फिर कहें तो बेहतर देखना चाहते है। यह ट्रैन हर गुजरते स्टेशन के साथ आंखों में सपने लिए बच्चों और उनके पेरेंट्स को समेटते जाती है। जिसकी आहट आपको इस ट्रैन में चढ़ने के साथ ही मिल जाती है, जहां एक ओर आप अपनी सीट खोजने की आपा धापी  में व्यस्त होते हो तो वही दूसरी तरफ पूरे आइल में हर गुजरते बर्थ के साथ ये सुनने को मिलता है की मेरे लड़के/लड़की ने ये एग्जाम दिया ,उस एग्जाम का कटऑफ इतना गया। इन शार्ट में बोला जाए तो ये गलत नही होगा की ये ट्रैन एक चलती फिरती Engineering  और Medical एग्जाम की अपडेटेड ब्रॉउचर है ।
 ट्रैन खुलने के साथ ही , "हाँ ट्रैन मिल गई"  के बाद जो दूसरी कॉल होती है वहाँ कोटा में पहले से पहुचे पहचान के स्टुडेंट के पास, हा बबुआ ट्रैन में चढ़ गइल बानी जा तहरा बगल वाला रूम खाली बा न अभियो उहा पहुच के फोन करम । कहा पहुँचे के बा ? ..... ठीक बा।
इसके साथ ही बच्चों को सीट पकड़ाने के बाद पेरेंट्स का गोलमेज सम्मेलन स्टार्ट होता है । जिसमें हर कोई अपने अपने जानकारी के अनुसार उस सम्मेलन में अपने को मुख्य आकर्षण केंद्र बनाने की कोशिश करता है,  और उन्हीं में कुछ  नए नवेले कोटा जा रहे पैरेंट्स के बीच वो भी पैरेन्ट्स होते है जिनके बच्चे पहले से वहाँ पढ़ रहे है । वो स्वतः ही बाकियों से थोड़े ऊपर होते है, इन शॉर्ट कहे तो Experienced... वो इन नए जो पहली बार जा रहे है उनके मार्गदर्शक बन जाते है... और पूरी महफ़िल मार लेते हैं   "अरे चिंता मत करि भाई साहब हमरो लइकवा उहे बा... फलनवा कोचिंग में... बड़ा बढ़िया बा उ... पिछला साल हाताना लाइका निकलले रहन ... हमहू उहे में एडमिशन करा देनी हा...  बगले में होस्टल दिला देनी सामने ही कोचिंग के... पैसा त लागत ह लेकिन बड़ा बढ़िया  फैसिलिटी ब उहा...  देखी हमनी के त ई हे न कर सके नी जा .... बाकी त लइकवा के ही न करे के बा ... तभी उनमे से कुछ पेरेंट्स जो एडमिशन करने के पहले ही रिजल्ट को लेकर Sure  है, बोलते हैं। कइसे न निकली जी... ई लोग के पढ़हिं खाती न भेजत हए जा अउर का काम ही बा ई लोग के... खा अउर पढ़ा...  ई लोग के त कपड़ो नेईखे धोवे के .... हमनी के त जब पढ़त रही जा त कामो करि जा , खाना बनाई जा, अउर कपड़ो धोइ जा फिर पढ़ी जा। पेट काट काट के रिजल्ट ही लावे खाती भेजत हई जा ।
उन गोलमेज सम्मेलनों से परे दूसरी तरफ  बच्चे जो पहली बार कोटा जा रहे वो  अपनी एक अलग ख्वाबी दुनिया बनाने में व्यस्त दिखते है कुछ दोस्तों से बिछड़ने का मलाल और कुछ नए दोस्त बनाने की उम्मीद और उन सब उम्मीदों पे भारी दिखता है अपने पेरेंट्स की उम्मीदों पे खरे उतरने की जद्दोजहद और उसकी प्रेशर । लेकिन ये 21वी सताब्दी के बच्चे उन चर्चाओं से इतर PUBG में थोड़ा प्रेशर कम करने की कोशिश करते है, और पेरेंट्स की गोलमेज के  बीच इनका PUBG सम्मेलन शुरू होता है...  अरे राहुल तू हमारा फॉलो कर ,उहा Pochanki  में न कूदना आगे चल... मार मार... बैकअप दे ...  ले साला गोली मार दिहिस... अरे रिवाइव कर रे ... चल ही रहा होता है की इनकी शोरगुल से पेरेंट्स का ध्यान भांग होता है और उधर से आवाज आती है... ई कुल का चलत बा... फोन छीन लेम...  ये सुनते ही उनका रिवाइव होने का मौका खत्म हो जाता है... और फोन वापस रिवाइव होने की उम्मीद में बैग में चला जाता है । और तब बच्चों को ट्रैन की बाहरी दुनिया से रूबरू होने का मौका आता है... सोते, जागते, ऊंघते हुए वो कभी बाहर देखते है कभी पूछते है ये जगह निकल गया ? ताज महल निकाला ??? वो ट्रैन से दिखेगा की नही ??? और  इन्हीं सवालों के साथ ट्रैन आगे बढ़ते चली जाती है। उधर पैरेंट्स कुछ फुरसत के वक़्त अपने फोन पे बात करते हुए बिताते है... अरे फलनवा भैया अभी कोटा जात हई हो लइकवा के यह एडमिशन करावे, सोचनी की अब दसवाँ पास कर गइल त उहाँ एडमिशन करा दी इहो बड़ा जिद्द करत रहल हा। ... हा ठीक बा सब... ट्रेनवा थोड़े लेटे चलत बा... देख शाम ले पहुँची । .... ठीक बा भैया गोड़ लगतानी उहाँ पहुच के बात करम ।
इन्ही चर्चाओं का साथ सपनों से भरी रेलगाड़ी अपने गंतव्य कोटा जं की तरफ बढ़ते रहती है। 
अब इन Ambitious पेरेंट्स कौन समझाए की आपका काम घोड़े को रेस के लिए तैयार करना है , दौड़ना घोड़े का काम है और रेस में एक ही विजेता होता है । उसे दौड़ने दे , खुल कर बिना किसी प्रेशर के तभी न वो अपनी काबिलियत के हिसाब से परफॉर्म करेगा । बाकी हार जीत तो लगी रहती है क्या पता वो इस रेस में हार जाए लेकिन इस रेस के लिए की गयी तैयारी के कारण वो कोई और बेहतर रेस जीत जाए ।

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