Home Is Where the Heart Belongs
यह उन सभी लड़कों की कहानी है जो बिहार के किसी छोटे से गाँव , कस्बे या शहर से एक बैग में कपड़े , माँ के हाथ का थोड़ा - सा खाना , पिता की उम्मीदें और आँखों में बड़े - बड़े सपने लेकर निकले थे। जो पढ़ाई के लिए घर से दूर गए , फिर नौकरी के लिए और धीरे - धीरे बड़े शहरों की भीड़ में इतने व्यस्त हो गए कि कभी - कभी खुद से मिलना भी भूल गए। घर छोड़े हुए बहुत साल हो गए हैं। सबसे पहले पढ़ाई के लिए निकला था , तब लगा था कि बस कुछ साल की बात है , थोड़ा पढ़ - लिख लूँगा , अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँगा , फिर सब ठीक हो जाएगा। माँ से कहकर निकला था , “ चिंता मत करिहऽ , जल्दीए आ जाइम। ” माँ ने भी हँसकर कहा था , “ ठीक से खाना खाइहऽ , समय पर सोइहऽ , और पैसा हिसाब से खर्च करिहऽ। ” पिताजी ने हमेशा की तरह ज्यादा कुछ नहीं कहा था। बस जाते समय कुछ पैसे हाथ में रख दिए थे और बोले थे , “ मन लगा के पढ़िहा , एहिजा क चिंता मत करिहा। ” उस दिन शायद पहली बार समझ नहीं पा...