Home Is Where the Heart Belongs

 

यह उन सभी लड़कों की कहानी है जो बिहार के किसी छोटे से गाँव, कस्बे या शहर से एक बैग में कपड़े, माँ के हाथ का थोड़ा-सा खाना, पिता की उम्मीदें और आँखों में बड़े-बड़े सपने लेकर निकले थे। जो पढ़ाई के लिए घर से दूर गए, फिर नौकरी के लिए और धीरे-धीरे बड़े शहरों की भीड़ में इतने व्यस्त हो गए कि कभी-कभी खुद से मिलना भी भूल गए।

घर छोड़े हुए बहुत साल हो गए हैं। सबसे पहले पढ़ाई के लिए निकला था, तब लगा था कि बस कुछ साल की बात है, थोड़ा पढ़-लिख लूँगा, अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँगा, फिर सब ठीक हो जाएगा। माँ से कहकर निकला था, “चिंता मत करिहऽ, जल्दीए आ जाइम।” माँ ने भी हँसकर कहा था, “ठीक से खाना खाइहऽ, समय पर सोइहऽ, और पैसा हिसाब से खर्च करिहऽ।” पिताजी ने हमेशा की तरह ज्यादा कुछ नहीं कहा था। बस जाते समय कुछ पैसे हाथ में रख दिए थे और बोले थे, “मन लगा के पढ़िहा, एहिजा क चिंता मत करिहा।” उस दिन शायद पहली बार समझ नहीं पाया था कि उन पैसों में सिर्फ पैसे नहीं थे, उनमें पिताजी की कई सालों की बचत थी, माँ की छोटी-छोटी इच्छाओं का त्याग, और पूरे परिवार की एक उम्मीद थी कि उनका बेटा एक दिन कुछ बन जाएगा। मैं भी खुश था, आँखों में सपने थे, लगता था कि दुनिया जीत लूँगा। लेकिन घर से दूर आकर पता चला कि सपने देखना आसान है, उन्हें पूरा करने की कीमत चुकाना थोड़ा मुश्किल, वो एक अंग्रेजी में कहते हैं न कि – “Dreams are Free, But Hustle is Sold Separately.”

शुरुआत एक छोटे से कमरे से हुई थी, एक कमरा, कुछ बर्तन, एक गद्दा, एक पंखा और बहुत सारी जिम्मेदारियाँ। कभी कमरा इतना गर्म होता कि रात भर नींद नहीं आती, कभी सर्दियों में रजाई भी कम पड़ जाती, कभी बिजली चली जाती, कभी पानी नहीं आता, कभी मकान मालिक किराए के लिए याद दिलाता, तो कभी महीने के आखिरी दिनों में जेब का हिसाब लगाते-लगाते मन उदास हो जाता। घर से फ़ोन आने पर पर माँ पूछती - खाना खा ले ला ? बढ़िया से खइहा, और पइसा कि जरुरत लगी त बोलिहा, और मैं कह देता था - हाँ माँ, खा लेनी। कभी-कभी सच में खाया होता था, और कभी बस चाय-बिस्कुट से काम चलाया होता था, माँ पूछती थी-  सब ठीक बा न ? और मेरा जवाब हमेशा एक ही होता था- हाँ माँ, सब बढ़िया बा, तु चिंता मत करिहा। पर उनको कैसे बताता कि जिस कमरे में मैं रहता हूँ, वहाँ कभी-कभी इतनी खामोशी होती है कि अपने ही विचारों की आवाज़ सुनाई देने लगती है, कैसे बताता कि कभी-कभी बिना किसी वजह के रोने का मन करता है, कैसे बताता कि पूरे दिन लोगों के बीच रहने के बाद भी शाम को लौटकर कमरा काटने दौड़ता है। क्योंकि घर पर पहले से ही बहुत सारी उम्मीदें थीं, मैं अपनी परेशानियों का बोझ उन पर कैसे डाल देता?

धीरे-धीरे पढ़ाई खत्म हुई, फिर नौकरी की तलाश शुरू हुई,फॉर्म भरना, परीक्षा देना, इंटरव्यू के लिए जाना, रिजल्ट का इंतजार करना, कभी सफलता करीब आकर भी हाथ से निकल जाती, कभी किसी दोस्त का चयन हो जाता और मैं उसे बधाई देकर रात को चुपचाप अपने बारे में सोचता रहता। फोन पर पिताजी कहते- कोई बात ना बा, मेहनत करत रह, लागल रहा मन लगा के, सब ठीक हो जाई। मुझे पता था कि वे मेरा हौसला बढ़ा रहे हैं, लेकिन कभी-कभी सोचता था कि अगर इस बार भी नहीं हुआ तो? अगर इतने साल घर से दूर रहने के बाद भी कुछ नहीं कर पाया तो? अगर माँ- पिताजी की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया तो? ये सवाल किसी किताब में नहीं मिलते, इनका जवाब किसी दोस्त के पास भी नहीं होता, इन्हें इंसान रात के दो बजे अपने तकिए के साथ बाँटता है, जब बाकी दुनिया सो रही होती है।

और फिर एक दिन नौकरी मिल गई, घर में खुशी थी, माँ ने शायद सबसे पहले भगवान को धन्यवाद दिया होगा,  पिताजी ने गाँव में किसी से कहा होगा कि- हमर बेटवा के नौकरी लग गईल। रिश्तेदारों के फोन आए, पड़ोसियों ने बधाई दी, घर में मिठाई बँटी। और मैं? मैं भी बहुत खुश था, लेकिन उस खुशी के पीछे एक अजीब-सी थकान थी, जैसे कई सालों से कंधों पर रखा कोई भारी बोझ थोड़ा हल्का हुआ हो।

सोचा था, नौकरी लग जाएगी तो जिंदगी आसान हो जाएगी, पर जिंदगी ने बस अपनी परेशानियों का रूप बदल लिया। अब किताबों की जगह ऑफिस की फाइलें थीं, परीक्षाओं की जगह काम के लक्ष्य थे, रिजल्ट की जगह परफॉर्मेंस थी। अब छुट्टी माँगने से पहले कैलेंडर देखना पड़ता था, घर जाने से पहले ट्रेन की टिकट, ऑफिस का काम, छुट्टियों का हिसाब और खर्चों का बजट बनाना पड़ता था। पहले पढ़ाई के लिए घर से दूर था, अब कमाने के लिए दूर था। पहले माँ से कहता था कि पढ़ाई खत्म होते ही आ जाऊँगा, अब कहता हूँ कि थोड़ा काम कम हो जाए, फिर आऊँगा। पहले लगता था कि नौकरी लगते ही घर वालों को समय दूँगा, अब महीने की तनख्वाह आते ही किराया, बिजली का बिल, राशन, आने-जाने का खर्च और दूसरी जिम्मेदारियाँ अपना हिस्सा माँगने लगती हैं। महीने के आखिरी दिनों में आज भी हिसाब लगाना पड़ता है, फर्क बस इतना है कि अब अपने खर्च के साथ-साथ घर के खर्च की चिंता भी रहती है। कभी अपने लिए कोई अच्छी चीज खरीदने का मन करता है, फिर कोई जरूरत याद आ जाती है, कभी दोस्तों के साथ घूमने का मन करता है, फिर अगले महीने घर जाने का खर्च याद आ जाता है।

और सबसे अजीब बात जानते हो? जिस दिन तनख्वाह आती है, उस दिन सबसे ज्यादा खुशी अपने लिए कुछ खरीदने में नहीं, बल्कि घर पैसे भेजने में मिलती है। माँ फोन पर कहती है- अपना कहती भी राखल करा, और मैं हँसकर कहता हूँ- हाँ माँ, ले ले बानी। लेकिन माँ शायद आज भी नहीं जानती कि उसके बेटे की सबसे बड़ी बचत बैंक में नहीं, उसके चेहरे की उस मुस्कान में है जो फोन पर उसकी आवाज सुनकर आ जाती है।

घर से दूर रहने वाला लड़का उम्र से पहले बड़ा हो जाता है, उसे कम उम्र में समझ आ जाता है कि बीमार होने पर दवा खुद खरीदनी पड़ती है, बुखार में भी कभी ऑफिस जाना पड़ता है, तबीयत खराब हो तो माँ के हाथ का पानी नहीं, खुद उठकर पानी पीना पड़ता है। जब कमरे में खाना बनाने का मन नहीं करता, तब भी भूख लगती है, जब किसी से बात करने का मन होता है, तब सब अपने-अपने काम में व्यस्त होते हैं, जब दिल बहुत उदास होता है, तब किसी को गले लगाने के लिए अपना कोई पास नहीं होता। कभी रविवार को कपड़े धोते हुए घर की याद आती है, कभी बर्तन माँजते हुए माँ याद आती है, कभी ऑफिस से थककर लौटते हुए पिताजी याद आते हैं, जो पूरे दिन मेहनत करके भी घर आते थे तो परिवार के सामने अपनी थकान छिपा लेते थे। तब समझ आता है कि हम जिन लोगों को बचपन में बहुत साधारण समझते थे, वे असल में कितने असाधारण थे।

और बिहार जैसे राज्यों से आने वाले मेरे जैसे लड़के तो शायद इस दर्द को थोड़ा और गहराई से समझते हैं, क्योंकि हमारे लिए घर सिर्फ चार दीवारों का नाम नहीं है। घर वह जगह है जहाँ सुबह माँ की आवाज से नींद खुलती थी, जहाँ आँगन में धूप आती थी, जहाँ रसोई से आती दाल-भात की खुशबू पूरे घर को अपना बना देती थी, जहाँ गर्मियों में छत पर सोते हुए आसमान के तारे गिनते थे, जहाँ बिजली चली जाए तो हाथ का पंखा भी किसी अपने के पास होने का एहसास देता था। घर वह जगह है जहाँ बिना बताए भी कोई समझ जाता था कि आज मन ठीक नहीं है, जहाँ भूख लगने पर यह नहीं सोचना पड़ता था कि खाना कौन बनाएगा, जहाँ जेब में पैसे न हों, तब भी लगता था कि मैं अमीर हूँ, क्योंकि मेरे पास मेरा परिवार है। और यहाँ बड़े शहर में? यहाँ हजारों लोग हैं, मगर अपना कोई नहीं, यहाँ रोशनी बहुत है, मगर कभी-कभी जिंदगी में अँधेरा लगता है, यहाँ खाने के लिए सैकड़ों विकल्प हैं, मगर माँ के हाथ की सादी दाल-भात जैसी तसल्ली कहीं नहीं मिलती। यहाँ लोग पूछते हैं- क्या हाल है भाई? लेकिन बहुत कम लोग यह जानना चाहते हैं कि सच में क्या हाल है। यहाँ हम मुस्कुराना सीख जाते हैं, भले ही अंदर से टूट रहे हों, हम अपनी परेशानी को मजाक में बदलना सीख जाते हैं। हम, सब बढ़िया है, कहते-कहते इतने अच्छे अभिनेता बन जाते हैं कि कभी-कभी खुद को भी यकीन दिला देते हैं कि सब सच में बढ़िया है।

फिर त्योहार आते हैं, दिवाली आती है, छठ आता है, होली आती है। ऑफिस में छुट्टियों की चर्चा होती है, कोई घूमने की योजना बनाता है, कोई दोस्तों के साथ पार्टी की, और हम सबसे पहले ट्रेन की टिकट देखते हैं। छठ के समय तो मन जैसे शरीर से पहले ही घर पहुँच जाता है, याद आता है वह घाट, वह सूप, वह दौरा, केले के पत्ते, ठेकुआ की खुशबू, घर की साफ-सफाई, माँ का सुबह से काम में लगे रहना और पिताजी का हर छोटी-बड़ी व्यवस्था में हाथ बँटाना। याद आती है वह सुबह के अर्घ के समय जब पूरा गाँव जागता है, जब घाट पर जाते हुए रास्ते में हर चेहरा अपना लगता है। जब डूबते सूरज और उगते सूरज को अर्घ्य देते समय लगता है कि दुनिया की सारी परेशानियाँ कुछ पल के लिए थम गई हैं। और फिर हम यहाँ होते हैं, किसी ऑफिस की छुट्टी का इंतजार करते हुए, ट्रेन की वेटिंग लिस्ट देखते हुए, किसी सहकर्मी को छठ की छुट्टी के बारे में समझाते हुए, कभी टिकट मिल जाती है, कभी नहीं मिलती, कभी छुट्टी मिलती है, कभी काम बीच में आ जाता है। और जिस साल घर नहीं जा पाते, उस साल छठ सिर्फ एक पर्व नहीं रहता, वह एक कसक बन जाता है, फोन पर वीडियो कॉल करते हैं, माँ घाट दिखाती है, घर के लोग घर क लोग मुस्कुराते हुए बोलते हैं, - अगिला बार जरूर आईहा । हम भी कहते हैं- हाँ, अगिला बार पक्का आईंम । फोन कट जाता है, और कमरे में कुछ देर तक वही घाट, वही घर, वही लोग घूमते रहते हैं, उस दिन समझ आता है कि दूरी किलोमीटर में नहीं मापी जाती, दूरी उस समय में मापी जाती है जब अपने घर में कोई खुशी होती है और हम उसमें शामिल नहीं हो पाते। जब माँ की तबीयत खराब होती है और हम फोन पर पूछने के अलावा कुछ नहीं कर पाते, जब पिताजी उम्र के साथ थोड़े कमजोर होने लगते हैं और हमें अचानक एहसास होता है कि हम जिस दिन लौटने की योजना बना रहे हैं, समय उस दिन का इंतजार नहीं कर रहा। जब घर के छोटे बच्चे बड़े हो जाते हैं और हमें उनकी बचपन की बातें सिर्फ तस्वीरों से पता चलती हैं, जब माँ के बालों में सफेदी बढ़ जाती है और हमें लगता है कि पिछली बार तो इतने सफेद नहीं थे, जब पिताजी की आवाज में पहले से ज्यादा थकान सुनाई देने लगती है, और हम सोचते हैं कि क्या मैं सच में अपने परिवार के लिए जिंदगी बना रहा हूँ, या जिंदगी बनाने की कोशिश में उनके साथ जीना ही भूलता जा रहा हूँ? इस सवाल का कोई आसान जवाब नहीं है, क्योंकि हम घर से दूर अपनी खुशी के लिए ही नहीं गए थे। हम माँ- पिताजी की मेहनत को एक बेहतर कल में बदलने निकले थे, हम चाहते थे कि जिस परिवार ने हमारे लिए अपनी इच्छाएँ छोड़ीं, उसे कभी किसी चीज की कमी न हो, हम चाहते थे कि बाबूजी को उम्र के इस पड़ाव पर थोड़ा आराम मिले। माँ को अपनी जरूरतों के लिए बार-बार सोचना न पड़े। घर में कोई परेशानी आए तो परिवार को यह न लगे कि पैसों की वजह से सब रुक जाएगा।

लेकिन इन सबके बीच एक छोटी-सी बात भूल गए कि, माँ को सिर्फ पैसे नहीं चाहिए थे, उन्हें कभी-कभी अपने बेटे से लंबी बात करनी थी, पिताजी को सिर्फ अपने बेटे की सफलता पर गर्व नहीं करना था बल्कि उन्हें कभी-कभी उसके साथ बैठकर चाय भी पीनी थी। घर को सिर्फ पैसे भेजने वाला बेटा नहीं चाहिए था, उसे वह बेटा भी चाहिए था जो बिना किसी काम के आँगन में बैठा रहे, माँ की बातें सुने, पिताजी के पास बैठकर दुनिया भर की बातें करे और रात को कहे कि - माई, आज खाना थोड़े ज्यादा बना दिहे , भूख ज्यादा लागल बा। शायद यही सबसे बड़ी विडंबना है कि हम घर छोड़ते हैं ताकि घर को बेहतर बना सकें, फिर उसी घर तक पहुँचने के लिए छुट्टियों का इंतजार करते हैं। हम कमाते हैं ताकि अपने लोगों की जिंदगी आसान बना सकें, फिर उनके साथ बिताने के लिए समय माँगना पड़ता है।

हम बड़े शहरों में अपनी पहचान बनाते हैं। लेकिन जब कोई पूछता है कि कहाँ के हो? तो सबसे पहले किसी कंपनी या शहर का नाम नहीं आता, तब दिल कहता है-  बिहार से हूँ, घर गाँव में है, माँ- पिताजी वहीं रहते हैं। और फिर अचानक उस गाँव की हर छोटी चीज की कीमत बढ़ जाती है, वह टूटी हुई सड़क, वह पुराना दरवाजा, वह आँगन, वह चापाकल, वह पड़ोस की चाची, वह बचपन का दोस्त, वह शाम को मंदिर से आती घंटी की आवाज। जिन चीजों से कभी भागने का मन करता था, आज उन्हीं के पास लौटने का मन करता है, कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर जिंदगी फिर से शुरू होती, तो क्या मैं घर छोड़कर आता? शायद हाँ।

क्योंकि सपने भी जरूरी थे, अपने पैरों पर खड़ा होना भी जरूरी था, माँ- पिताजी का सिर गर्व से ऊँचा करना भी जरूरी था। लेकिन शायद इस बार एक बात और समझकर निकलता, कि जिंदगी सिर्फ उस दिन का नाम नहीं है जब हमें सफलता मिलती है। जिंदगी उन दिनों में भी है जब माँ खाना परोसकर हमारा इंतजार करती है, उन शामों में भी है जब पिताजी दरवाजे की तरफ देखते हैं, उन सुबहों में भी है जब घर में सब साथ बैठकर चाय पीते हैं, और शायद मैं अपने घर वालों से थोड़ा ज्यादा कहता-  मैं ठीक हूँ, लेकिन तुम्हारी याद आती है, पैसे भेज दूँगा, लेकिन इस बार मेरे लिए थोड़ा समय भी बचाकर रखना। मैं बड़ा आदमी बनने की कोशिश कर रहा हूँ, लेकिन तुम्हारे सामने आज भी वही छोटा-सा लड़का हूँ, आज भी जब घर जाने की टिकट बुक करता हूँ, तो एक अजीब-सी खुशी होती है, लगता है जैसे जिंदगी के सबसे जरूरी कामों में से एक काम पूरा होने वाला है।

फिर यात्रा का दिन आता है, स्टेशन की भीड़, ट्रेन की आवाज, सामान से भरा बैग, खिड़की के पास की सीट और रास्ते में बदलते हुए शहर, जैसे-जैसे ट्रेन घर के करीब आती है, मन में कुछ बदलने लगता है। फोन पर माँ से कहता हूँ, बस, थोड़ी देर में देरी में पहुंच जाइम । वह शायद तब तक कई बार घड़ी देख चुकी होती है,खाना तैयार कर कर के। पिताजी हमेशा स्टेशन पे लेने आते है, और फिर वह पल आता है, घर का दरवाजा खुलता है, माँ सामने होती है। उस पल न नौकरी याद आती है, न शहर, न परेशानियाँ, न दुनिया की दौड़, बस मन करता है कि बैग नीचे रख दूँ और माँ के गले लगकर कुछ देर बच्चा बना रहूँ। माँ बोलती  है , थक  गइल होइबा, हाथ मुँह धो ला, खाना लगा दी न ? और मुझे लगता है कि दुनिया में इससे सुंदर सवाल शायद कोई नहीं है, क्योंकि इतने सालों से हर जगह खुद को साबित करने के बाद, उस एक घर में कोई ऐसा है जिसे मेरे सफल होने से पहले मेरे भूखे होने की चिंता है। पिताजी पूछते हैं, काम धाम कईसन चालत बा ? मैं बताने लगता हूँ, वह ध्यान से सुनते हैं, कभी सलाह देते हैं, कभी मुस्कुराते हैं, शायद वह सब कुछ पूरी तरह नहीं समझते, लेकिन मेरी बात सुनने के लिए उनके पास हमेशा जगह होती है। रात को खाना खाते हुए लगता है कि इतने दिनों की सारी थकान धीरे-धीरे उतर रही है, माँ बार-बार पूछती है- और लेबा ? मैं कहता हूँ, बस हो गइल, अब जगह ना बा। वह फिर भी थोड़ा-सा और परोस देती है, और मैं मुस्कुरा देता हूँ, क्योंकि मुझे पता है, उसके लिए मैं आज भी वही बच्चा हूँ जो स्कूल से लौटकर भूख लगने की शिकायत करता था। घर आकर समझ आता है कि हमें हमेशा किसी बड़ी चीज की जरूरत नहीं होती, कभी-कभी हमें बस एक ऐसी जगह चाहिए होती है जहाँ हम बिना कुछ बने, बिना कुछ साबित किए, अपने जैसे रह सकें,जहाँ हमारी तनख्वाह से ज्यादा हमारी तबीयत की चिंता हो, जहाँ हमारी उपलब्धियों से ज्यादा हमारी गैरमौजूदगी महसूस की जाए, जहाँ हमारे पास पैसे कम हों तो भी हमारी थाली खाली न रहे, जहाँ हम हारकर लौटें तो भी दरवाजा खुला मिले, और जहाँ दुनिया के लिए हम चाहे जो हों, किसी के लिए हमेशा उसका बच्चा बने रहें।

आज भी मैं घर से दूर हूँ, सुबह उठता हूँ, काम पर जाता हूँ, जिम्मेदारियाँ निभाता हूँ, पैसे कमाता हूँ और भविष्य के लिए योजनाएँ बनाता हूँ,मैं अब भी चाहता हूँ कि माँ- पिताजी को वह सब दे सकूँ जिसका उन्होंने कभी सपना देखा था, मैं अब भी अपने सपनों को पूरा करना चाहता हूँ, लेकिन अब एक बात पहले से ज्यादा समझता हूँ, घर सिर्फ वह जगह नहीं जहाँ हम रहते हैं, घर वह जगह है जहाँ लौटने की इच्छा कभी खत्म नहीं होती। घर वह आवाज है जिसे हजारों आवाजों के बीच भी पहचान लेते हैं, घर वह नंबर है जिस पर फोन करते समय हमें अपने शब्द सोचने नहीं पड़ते, घर वह आँगन है जहाँ लौटकर हम अपनी उम्र भूल जाते हैं, घर वह रिश्ता है जो हमारी असफलताओं के बाद भी हमसे मुँह नहीं मोड़ता, और घर वह एहसास है जिसे हम जितना पीछे छोड़कर आते हैं, वह उतना ही हमारे भीतर बसता चला जाता है। क्योंकि घर छोड़ने से हम बड़े शहरों में रहना सीख जाते हैं, लेकिन घर को अपने दिल से निकालकर कहीं और बसाना कभी नहीं सीख पाते।

अगर तुम भी मेरे जैसे हीं बिहार के किसी गाँव या छोटे शहर से निकलकर किसी दूसरे शहर में अपनी जिंदगी बना रहे हो, अगर तुमने भी माँ से कहा था कि जल्दी लौटूँगा और अब कैलेंडर देखकर छुट्टियाँ गिनते हो, अगर तुमने भी फोन पर अपनी परेशानी छिपाकर कहा है कि- सब बढ़िया है, तो एक बात याद रखना कि तुम सिर्फ अपने लिए संघर्ष नहीं कर रहे हो, तुम उन सपनों के लिए भी लड़ रहे हो जो तुम्हारे माता-पिता ने अपनी आँखों में तुम्हारे जन्म के दिन से सँजो रखे थे। लेकिन इस लड़ाई में अपने घर को इतना पीछे मत छोड़ देना कि एक दिन लौटने के लिए सिर्फ यादें बचें। माँ को फोन कर लिया करो, बिना किसी खास वजह के, पिताजी के साथ थोड़ा समय बिता लिया करो, चाहे बातें कम ही क्यों न हों। घर जाने का मौका मिले तो हर बार यह मत सोचना कि अगली बार चले जाएँगे, क्योंकि पैसे फिर कमाए जा सकते हैं, नौकरी में फिर छुट्टियाँ मिल सकती हैं, दूसरे शहर में फिर एक और कमरा मिल सकता है, लेकिन माँ- पिताजी के साथ बीता हुआ समय वापस नहीं मिलता।

और आखिर में, इतने सालों की भागदौड़ के बाद मैंने जिंदगी से बस इतना सीखा है कि सफलता वह नहीं कि तुम्हारे पास लौटने के लिए एक बड़ा घर हो, सफलता यह है कि उस घर में कोई तुम्हारा इंतजार कर रहा हो, घर वहीं है जहाँ दिल बसता है, और मेरा दिल आज भी वहीं है- उस घर में, जहाँ माँ की आवाज है, पिताजी की छाँव है, आँगन की मिट्टी है और एक ऐसा सुकून है जिसे दुनिया का कोई बड़ा शहर कभी नहीं दे सकता। हम घर से दूर अपना भविष्य बनाने निकले थे, लेकिन हर गुजरते साल के साथ समझ आया कि जिस घर को पीछे छोड़ आए थे, वही हमारी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा था।


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